भारतीय अदालत ने मृत पादरी के खाते में जमा धनराशि कैथोलिक धर्मसंघ को सौंपने का आदेश दिया
न्रिश्तेदारों को 63,000 अमेरिकी डॉलर की राशि लौटाने का निर्देश
भारत के मद्रास उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि एक कैथोलिक धर्मसंघ मृत पादरी के सावधि जमा खाते में रखी धनराशि का हकदार है। अदालत ने उनके रिश्तेदारों को 56 लाख रुपये (63,000 अमेरिकी डॉलर) लौटाने का आदेश दिया, जिन्हें उन्होंने पादरी का कानूनी वारिस होने का दावा करके निकाल लिया था।
दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु में स्थित अदालत की मदुरै पीठ ने 13 अक्टूबर को यह आदेश जारी किया। इसमें फादर देवकुमार अरुलानन्थम के परिवार के सदस्यों को एक महीने के भीतर यह राशि सोसाइटी ऑफ कैथोलिक एपोस्टोलेट, जिसे पैलोटाइन धर्मसंघ के नाम से भी जाना जाता है, को लौटाने का निर्देश दिया गया। आदेश का पालन न करने पर सालाना 9 प्रतिशत ब्याज देना होगा।
अदालत ने दस आज्ञाओं का भी उल्लेख करते हुए कहा, “तू चोरी न करना,” और स्पष्ट किया कि “कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे की संपत्ति को अपने पास रखने का वैध अधिकार नहीं रखता।”
इस फैसले ने तमिलनाडु के करूर की जिला अदालत के 18 सितंबर 2024 के निर्णय को पलट दिया। जिला अदालत ने पादरी के तीन रिश्तेदारों को उनका कानूनी वारिस घोषित किया था और उनके धर्मसंघ की आपत्तियों के बावजूद उन्हें जमा राशि निकालने की अनुमति दी थी।
प्रेरक वक्ता अरुलानन्थम का फरवरी 2018 में पड़ोसी राज्य कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान निधन हो गया था।
सोसाइटी ऑफ कैथोलिक एपोस्टोलेट के असम्प्शन ऑफ द ब्लेस्ड वर्जिन मैरी प्रांत ने जिला अदालत के फैसले के खिलाफ अपील की। उसका तर्क था कि पादरी द्वारा ली गई धार्मिक प्रतिज्ञाओं और धन अर्जित करने की परिस्थितियों को देखते हुए यह राशि धर्मसंघ की होनी चाहिए।
धर्मसंघ ने दलील दी, “धार्मिक संघ में प्रवेश करने और आवश्यक धार्मिक प्रतिज्ञाएँ लेने के बाद मृतक ने सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया था और अपने परिवार के सदस्यों के साथ संबंध तोड़ लिए थे।”
उसने कहा कि जमा राशि पादरी की निजी संपत्ति नहीं थी, बल्कि धार्मिक समुदाय के लाभ के लिए उसे न्यासीय जिम्मेदारी के तहत रखा गया था। धर्मसंघ ने अपने पक्ष के समर्थन में कैथोलिक कलीसियाई कानून का भी हवाला दिया।
धर्मसंघ ने आगे तर्क दिया कि रिश्तेदार केवल पादरी के साथ पारिवारिक संबंध होने या सावधि जमा राशि प्राप्त करने के लिए उनके द्वारा नामित किए जाने के आधार पर उस धन पर दावा नहीं कर सकते।
मृत्यु से पहले अरुलानन्थम ने एक नोट छोड़ा था, जिसमें उन्होंने अपने निजी सामान पर धर्मसंघ को अधिकार देने की अनुमति दी थी। हालांकि, इसमें पूर्वजों से विरासत में मिली संपत्ति को शामिल नहीं किया गया था।
उनके रिश्तेदारों ने धर्मसंघ के दावे का विरोध करते हुए कहा कि धार्मिक प्रतिज्ञाएँ लेने से किसी व्यक्ति का संपत्ति का स्वामित्व समाप्त नहीं हो जाता। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि भारत के उत्तराधिकार कानून के तहत वे उनकी संपत्ति के वारिस बनने के हकदार थे। उनका कहना था कि सावधि जमा खाते में लाभार्थियों के रूप में नामित किए जाने के कारण भी वे उस धनराशि के हकदार थे।
न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश और न्यायमूर्ति के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने फैसला सुनाया कि केवल इस आधार पर संपत्ति का स्वामित्व निर्धारित नहीं किया जा सकता कि जमा खाता पादरी के नाम पर था।
न्यायाधीशों ने कहा कि संपत्ति के स्वामित्व का निर्धारण करने में पादरी की धार्मिक प्रतिबद्धताएँ और संपत्ति अर्जित करने की परिस्थितियाँ महत्वपूर्ण हैं।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक संघ में प्रवेश करने से जुड़ी “नागरिक मृत्यु” की अवधारणा का अर्थ सांसारिक हितों और संबंधों का त्याग करना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि धार्मिक प्रतिज्ञाएँ लेने वाला व्यक्ति कानूनी व्यक्ति के रूप में अस्तित्व खो देता है या उसके सभी नागरिक अधिकार समाप्त हो जाते हैं।
न्यायाधीशों ने धार्मिक जीवन के दौरान अर्जित संपत्ति और उससे पहले की संपत्ति के बीच अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने जोर दिया कि परिवार से स्वतंत्र रूप से विरासत में मिली संपत्ति अपने आप किसी धार्मिक संघ की संपत्ति नहीं बन जाती।
मध्य भारत के मध्य प्रदेश राज्य में स्थित जबलपुर धर्मप्रांत के सेवानिवृत्त बिशप गेराल्ड अल्मेडा ने इस फैसले का स्वागत किया।
उन्होंने 15 अक्टूबर को यूसीए न्यूज़ से कहा, “उच्च न्यायालय का यह फैसला कानून की सही व्याख्या है और मैं इसका स्वागत करता हूँ।”
हालांकि, अल्मेडा ने कहा कि यह फैसला धर्मप्रांतीय पादरियों पर लागू नहीं होगा, क्योंकि वे सामान्यतः गरीबी की प्रतिज्ञा नहीं लेते।
उन्होंने कहा कि धार्मिक संघ अपने सदस्यों—जिनमें पादरी और नन शामिल हैं—के भरण-पोषण की व्यवस्था करते हैं। गरीबी की प्रतिज्ञा लेने वालों से निजी संपत्ति जमा करने की अपेक्षा नहीं की जाती।
अल्मेडा ने आगे कहा कि धार्मिक सदस्यों को मिलने वाले उपहार, जिनमें परिवार की ओर से दिए गए उपहार भी शामिल हैं, उनके वरिष्ठ अधिकारियों को सौंप दिए जाने चाहिए। इसके बाद वरिष्ठ अधिकारी तय करते हैं कि उस धन का उपयोग कैसे किया जाए।
इसके विपरीत, उन्होंने कहा कि धर्मप्रांतीय पादरी सामान्यतः निजी संपत्ति अर्जित करने और यह तय करने के लिए स्वतंत्र होते हैं कि वे अपनी संपत्ति किसे सौंपना चाहते हैं।